दर्दे - जहान

कहाँ, किस तरह, कैसा क्यों हूँ ? सोच रहा हूँ ऐसा क्यों हूँ ? काँटों के इस बियाबान में , मैं फूलों के जैसा क्यों हूँ ?

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अफसोस , बाग़ में है परिंदा नहीं कोई.............. (ग़ज़ल)

Posted On: 15 Mar, 2012 में

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मेरे सिवाय और वाशिंदा नहीं कोई ,
लगता है इस ज़हान में जिंदा नहीं कोई .

अब गूंजते हैं शहर में कातिल के ठहाके ,
जो दे सज़ाए – मौत वो फंदा नहीं कोई .

कहते हैं चोर क्या करें – बेरोज़गार हम ,
इसके सिवाय मुल्क में धंधा नहीं कोई .

जिसके शरीर पर न लगा दाग अब तलक ,
इतना हसीं आकाश में चंदा नहीं कोई .

हैं पेड़ भी, हैं फूल भी पत्ते भी हैं हरे ,
अफसोस बाग़ में है परिंदा नहीं कोई .



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20 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sanjay dixit के द्वारा
April 8, 2012

एक खूबसूरत और सार्थक ग़ज़ल के लिए बधाई

    Jayprakash Mishra के द्वारा
    April 10, 2012

    शुक्रिया संजय जी

dineshaastik के द्वारा
March 16, 2012

वाह…….खूबसूरत…..

    Jayprakash Mishra के द्वारा
    March 17, 2012

    दिनेश जी हौसला अफजाई के लिये आभार.

akraktale के द्वारा
March 16, 2012

मिश्रा जी, अब गूंजते हैं शहर में कातिल के ठहाके , जो दे सज़ाए – मौत वो फंदा नहीं कोई . सुन्दर गजल. बधाई.

    Jayprakash Mishra के द्वारा
    March 17, 2012

    आदर्णीय रक्तले जी आभार

मनु (tosi) के द्वारा
March 16, 2012

बहुत खूब! जयप्रकाश जी …… अच्छी प्रस्तुति

    Jayprakash Mishra के द्वारा
    March 17, 2012

    मनु जी हम आपके आभारी हैं.

Rakesh के द्वारा
March 16, 2012

बहुत खूब, दाद कुबूल करें.

    Jayprakash Mishra के द्वारा
    March 17, 2012

    राकेश जी शुक्रगुजार हूं….

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
March 16, 2012

निहायत खूब प्रस्तुति. बधाई.

    Jayprakash Mishra के द्वारा
    March 16, 2012

    Kushwaha ji shukra guzaar hun.

Aakash Tiwaari के द्वारा
March 16, 2012

जयप्रकाश जी, बहुत लाजवाब प्रस्तुती.. हैं पेड़ भी, हैं फूल भी पत्ते भी हैं हरे , अफसोस बाग़ में है परिंदा नहीं कोई . बहुत अच्छी लाइन.. आकाश तिवारी

    Jayprakash Mishra के द्वारा
    March 16, 2012

    आकाश जी शुक्रिया

March 15, 2012

सादर नमस्कार! कमल के भाव और अभिव्यक्ति…जवाब नहीं…….हार्दिक आभार.

    Jayprakash Mishra के द्वारा
    March 16, 2012

    अलीन जी आपकी हर प्रतिक्रिया शिरोधार्य है.

shashibhushan1959 के द्वारा
March 15, 2012

मान्यवर मिश्रा जी, सादर ! बहुत खूब ! सुन्दर और सशक्त रचना ! बधाई !

mataprasad के द्वारा
March 15, 2012

Jayprakash Mishra जी नमस्कार , बहुत सुन्दर प्रस्तुति ।। भ्रष्ट इस दौर में इक आश अभी बाकी है। लौ टिम-टिमा रही है आँधियों से , फिर से जगमगाने की आश अभी बाकी है ।।

Tamanna के द्वारा
March 15, 2012

बहुत सुंदर रचना मिश्रा जी….!!!   http://tamanna.jagranjunction.com/2012/03/14/congress-vs-samajwadi-party/

chandanrai के द्वारा
March 15, 2012

आदरणीय साहब, आपने हर महत्वपूर्ण बिंदु को छुआ है और उसका आंकलन किया है ! बहुत सटीक विश्लेषण और बिलकुल ठीक विचार ! बहुत बेहतर गजल Pls. comment on http://chandanrai.jagranjunction.com/Berojgar


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