दर्दे - जहान

कहाँ, किस तरह, कैसा क्यों हूँ ? सोच रहा हूँ ऐसा क्यों हूँ ? काँटों के इस बियाबान में , मैं फूलों के जैसा क्यों हूँ ?

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हारा कोई जीता कोई जनता को मिला क्या ...(ग़ज़ल)

Posted On: 2 Mar, 2012 में

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आई थी समंदर से वो उफान की तरह ,
मैं रह गया उजड़े हुए जापान की तरह .

मुंशी की तरह आज तक आया न किस्सागो ,
आया नहीं किस्सा कोई गोदान की तरह .

हारा कोई जीता कोई जनता को मिला क्या ,
रौंदी गई वो युद्ध के मैदान की तरह .

मिलती नहीं हर शख्स को मुमताज़ हर जगह ,
हर शख्स भी होता नहीं शाहजान की तरह .

खुशियों के मेज़बान हैं , लेकिन हमारे घर ,
आती रही नाकामियाँ मेहमान की तरह .

बूढ़े हुए मां – बाप तो कोने में रख दिए ,
घर के किसी टूटे हुए सामान की तरह .

हम फूल थे बस इसलिए तोड़े गए हर बार ,
पत्थर था वो पूजा गया भगवान की तरह .
…………………………………………………………………….. मेरी प्रस्तुत ग़ज़ल प्रतिष्ठित वेब – पत्रिका ” सृजन गाथा ” में प्रकाशित है और खासी चर्चित रही है

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28 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jayprakash Mishra के द्वारा
April 11, 2012

हारा कोई जीता कोई जनता को मिला क्या , रौंदी गई वो युद्ध के मैदान की तरह .

Jayprakash Mishra के द्वारा
April 4, 2012

हारा कोई जीता कोई, जनता को मिला क्या..

chandanrai के द्वारा
March 12, 2012

जय प्रकाश मिश्र जी नमस्कार ! आई थी समंदर से वो उफान की तरह , मैं रह गया उजड़े हुए जापान की तरह . मुंशी की तरह आज तक आया न किस्सागो , आया नहीं किस्सा कोई गोदान की तरह भाई मजा आ गया व्यंगात्मक कविता सुनी थी ये गजल सुरुचिपूर्ण भाव Read my poem at http://chandanrai.jagranjunction.com/Berojgar

jalaluddinkhan के द्वारा
March 8, 2012

एक अच्छी ग़ज़ल, हम फूल थे बस इसलिए तोड़े गए हर बार , पत्थर था वो पूजा गया भगवान की तरह . बेहतरीन शेर.बधाई.

munish के द्वारा
March 5, 2012

अमाँ जयप्रकाशजी इतना करार और चुभता हुआ भी न लिखो की लोगों को हार्ट अटैक ही हो जाए :) बहुत बढ़िया आपको और आपके परिवार को होली की शुभकामनाएं http://munish.jagranjunction.com/2011/03/19/%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%8F%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%95-%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A5%80-holi-contest/

    Jayprakash Mishra के द्वारा
    March 15, 2012

    Shukriya Munish ji , aapka andaze – bayaan achchha laga

March 5, 2012

सादर नमस्कार! बूढ़े हुए मां – बाप तो कोने में रख दिए , घर के किसी टूटे हुए सामान की तरह . हम फूल थे बस इसलिए तोड़े गए हर बार , पत्थर था वो पूजा गया भगवान की तरह ……तत्कालीन परिवेश पर चोट करती हुई पंक्ति….हार्दिक आभार! आप अच्छा लिखते हो, इस बात की प्रमाण देने की कोई आवश्यकता नहीं है. आशा करता हूँ कि मित्र प्रवीन की बातों पर आप गौर करेंगे……यह कुछ अटपटा सा लगता है.

dineshaastik के द्वारा
March 5, 2012

भावों से भरी हुई सुन्दर रचना के लिये बधाई एवं होली पर्व की हार्दिक शुभकामनायें। कृपया इसे पढ़कर समालोचनात्मक प्रतिक्रिया आवश्य दें…. http://dineshaastik.jagranjunction.com/?p=60&preview=trueक्या ईश्वर है (कुछ सवाल)

minujha के द्वारा
March 4, 2012

जयप्रकाश जी गजल को सम्मान मिलने की बधाई आपकी रचना इसकी हकदार भी थी बधाई 

ANAND PRAVIN के द्वारा
March 4, 2012

जयप्रकाश जी, नमस्कार बहुत ही उम्दा गजल आपकी ……..माँ बाप तो टूटे सामान ही बन के रह गएँ है इस दुनिया में आज कल… सुन्दर अभिव्यक्ति……किन्तु एक बात कहना चाहूँगा अन्यथा ना लें …….. आपकी प्रस्तुति अच्छी है और निश्चय ही पत्रिका “सृजन गाथा” में छपने योग्य है किन्तु इस की इस प्रकार लिख कर लोगों को दर्शाने से आपकी प्रतिष्टा को थोड़ा बट्टा लगेगा ……….बाकी आप खुद ही समझदार है ……. धन्यवाद लिखते रहीय..

    Jayprakash Mishra के द्वारा
    March 4, 2012

    Anand ji shukra guzar hun .

shashibhushan1959 के द्वारा
March 4, 2012

मान्यवर जयप्रकाश जी, सादर ! बहुत ही खूबसूरत प्रवाहमय ग़ज़ल ! हार्दिक बधाई !

    Jayprakash Mishra के द्वारा
    March 4, 2012

    Smmaananiy Shashi ji shukriya

nishamittal के द्वारा
March 3, 2012

जयप्रकाश जी सुन्दर भाव और प्रस्तुति

    Jayprakash Mishra के द्वारा
    March 4, 2012

    Nisha ji yah aapka aashirbaad hai

Amita Srivastava के द्वारा
March 3, 2012

जय प्रकाश जी भाव बहुत ही अच्छे है और शब्दों का समायोजन तो कमाल का है बधाई

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
March 3, 2012

बहुत अच्छी पकड़ है , आप की ग़ज़ल पर जयप्रकाश जी , बधाई !

akraktale के द्वारा
March 2, 2012

जयप्रकाश जी, हम फूल थे बस इसलिए तोड़े गए हर बार , पत्थर था वो पूजा गया भगवान की तरह . बहुत सुन्दर गजल, अवश्य ही सर्जन गाथा में प्रकाशन योग्य थी. वहां भी प्रकाशक मंडली में जयप्रकाश जी ही बैठे हैं.बधाई.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
March 2, 2012

बूढ़े हुए मां – बाप तो कोने में रख दिए , घर के किसी टूटे हुए सामान की तरह . हम फूल थे बस इसलिए तोड़े गए हर बार , पत्थर था वो पूजा गया भगवान की तरह . स्नेही, जय जी , सुन्दर भाव, प्रस्तुति सुन्दर

yogi sarswat के द्वारा
March 2, 2012

जय प्रकाश मिश्र जी नमस्कार ! आपकी ग़ज़ल में एक आकर्षण है हम फूल थे बस इसलिए तोड़े गए हर बार , पत्थर था वो पूजा गया भगवान की तरह . निश्चित ही आपकी ये ग़ज़ल यहाँ भी चर्चित होगी ! बहुत अच्छा लिखते हैं आप ! अपने लेख पर आपके विचार चाहूँगा ! कोई कालिदास क्यों बनेगा ? ( भारतीय राजनीति में सुधार ) http://yogensaraswat.jagranjunction.com/2012/02/23

    Jayprakash Mishra के द्वारा
    March 2, 2012

    Yogi ji shukriya

    yogi sarswat के द्वारा
    March 5, 2012

    जय प्रकाश मिश्र जी , मेरे लेख को भी थोडा समय दीजियेगा !

    yogi sarswat के द्वारा
    March 5, 2012

    जय प्रकाश जी , आप सीधे जागरण जंक्शन के “ज्यादा चर्चित ” ब्लॉग पर जायें और वहां ” कोई कालिदास क्यों बनेगा ” को हिट करें , वो मेरा ही ब्लॉग है ! आप वहां से पढ़ सकते हैं ! धन्यवाद !

Jayprakash Mishra के द्वारा
March 5, 2012

Yogi ji aapka blog khul nahi raha hai.


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