दर्दे - जहान

कहाँ, किस तरह, कैसा क्यों हूँ ? सोच रहा हूँ ऐसा क्यों हूँ ? काँटों के इस बियाबान में , मैं फूलों के जैसा क्यों हूँ ?

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चर्चा.........अन्ना को समर्पित कविता

Posted On: 3 Apr, 2012 में

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चर्चा नहीं होती छोटी – मोटी घटनाओं की
छोटी – मोटी घटनाएं
खो जाती हैं बड़े – बड़े हादसों के जंगल में

चर्चा नहीं होती माफियाओं के इलाके में किसी टपोरी की
जैसे घनघोर तूफ़ान में
उखड़ जाते हैं बादलों के पाँव

चर्चित नहीं होते हाँ – हुजूरी करने वाले
चर्चित नहीं होते कतार में
पीछे चलने वाले
जैसे बल्ब की रोशनी में
चर्चित नहीं होता दिया

जैसे सर्दियों में आग…………………..
रेगिस्तान में पानी
उसी तरह चाटुकारों की सभा में
उठा लेता है जो विद्रोह की कमान
चर्चित हो जाता है .

………………………………… यही मौका है टीम अन्ना को अपना हौसला नहीं खोना चाहिए . शुभकामनाओं सहित .

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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jayprakash Mishra के द्वारा
April 8, 2012

आदर्णीय रक्तले साहब आप यदि मेरे विचारों से सहमत हैं और  आदर्णीय अन्ना जी का समर्थन करते हैं तो यह मेरा और इस देश का सौभाग्य है.  अभी अनाथ बच्चियों के साथ हुआ कुकृत्य  सरकार की कुम्भकर्णी निद्रा का ज्वलंत उदाहरण  नहीं तो और क्या है.

akraktale के द्वारा
April 4, 2012

जयप्रकाश जी, देश की रग रग को दूषित करते भ्रष्टाचार के जहर के खिलाफ आन्दोलन का बीड़ा उठाये अन्ना जी के समर्थन में सुन्दर रचना आपकी. आपकी गिनती नगण्य हो किन्तु होने का सत्य कोई झुठला नहीं सकता.सार्थक बात कही आपने. साधुवाद.

follyofawiseman के द्वारा
April 4, 2012

वैसे तो मैं मूलतः कवि नहीं हूँ, किन्तु जागरण जंक्शन के कुछ कवियों से प्रेरित हो कर कविता लिखने का प्रथम प्रयास कर रहा हूँ, कविता अगर पसंद आए तो खुले दिल से मेरी सराहना कीजिएगा ताकि मैं और भी ऐसी खूबसूरत कविताएँ लिखने के लिए प्रेरित हो सकूँ……….आपका Wise Man ! ऊपर आम का छतनार, नीचे हरे घास हज़ार, और वन-तुलसी की लताएँ करने गलबहियाँ तैयार, लेके चाकू और कटार, जब हो ओलो का प्रहार, बिमला मौसी का परिवार, चुने टोकरी मे अमियाँ फिर डाले उनका आचार… यह खेल चले दो तीन महीने लगातार…. फिर आए जाड़े का मौसम, पड़े शीत की मार, छोटू को हो जाए बुखार….. डॉक्टर की दवाई फिर करे छोटू का उद्धार….. फिर आए गर्मी की ललकार, सर्वत्र मचे हाहाकार, और जब लाइट न हो और हो पंखे की दरकार, मचाए सब चीख-पुकार, चले प्रक्रिया यह बारंबार, फिर आए बसंती बहार, इस मौसम के बारे में मैं कहूँगा अगली बार…… तब तक के लिए मेरा सादर नमस्कार…..

    Jayprakash Mishra के द्वारा
    April 4, 2012

    आदर्णीय भाव अच्छे हैं , वैसे कविता यदि छन्दमुक्त लिखना है तो तुक मिलाना छोड़िये और लय पर ध्यान दीजिये. शुभकामनायें…… जयप्रकाश मिश्र

चन्दन राय के द्वारा
April 3, 2012

बहुत बेहतर भाव और जन जागरण के मसीहा को समर्पित सुंदर कविता Pls. comment on http://chandanrai.jagranjunction.com/

    Jayprakash Mishra के द्वारा
    April 4, 2012

    चन्दन जी कल मैंने एक लेख पढ़ा तो बहुत विचलित हुआ.  अन्ना कुछ भी कहते हों,किन्तु हमें यह ध्यान रखना होगा कि  वे जो भी कर रहे हैं , अपने लिये नहीं , बल्कि देश के लिये कर रहे हैं. 

Jayprakash Mishra के द्वारा
April 3, 2012

 हमें इस वक्त अन्ना का साथ देना चाहिये,  क्योंकि  वे जो  भी कर रहे हैं   अपने लिये नहीं, देश के लिये कर रहे हैं.

    dineshaastik के द्वारा
    April 3, 2012

    जय प्रकाश जी सच  कहा आपने हम  सबको, अन्ना को साथ  नहीं छोड़ना  चाहिये।


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