दर्दे - जहान

कहाँ, किस तरह, कैसा क्यों हूँ ? सोच रहा हूँ ऐसा क्यों हूँ ? काँटों के इस बियाबान में , मैं फूलों के जैसा क्यों हूँ ?

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जवाब चाहता हूँ

Posted On: 19 Apr, 2012 में

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आकाश खुला है तो क्या लाभ
चूम रही है डालियों को हवा
और हवा को वासंती धूप
क्या लाभ?
बांधे गए हों जब मुर्गे के पंख

तोड़ डालो चाहे चीन की दीवार
समतल बना दो चाहे हर गतिरोध
पर क्या दिलों में पड़ी एक क्षीण सी रेख
होने देगी हमें एक ?

क्यों हंसें हम …………….
क्यों मनाएं ज़श्न ?
कि डालर के मुकाबले हुआ है रुपया मजबूत
या प्रति व्यक्ति आय
हो गई है आधा लाख
जहां ख़ुदकुशी पर ख़ुदकुशी कर रहे हों किसान
या दिनोंदिन बढ़ रही हो भिखारियों की तादाद
क्या ये दिल्ली की सड़कें ………..
ये गगन चुम्बी इमारतें, ये मॉल
हमें ख़ुशी दे सकते हैं ?
जवाब चाहता हूँ – ये ओवरब्रिज, ये हाईवे, ये फुटपाथ
सैर के लिए हैं लग्ज़री कारों के
या बेघरों के शयन कक्ष .
—————————————-

जयप्रकाश मिश्र
मो – ०९३६९७७२०१२

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22 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

annurag sharma(Administrator) के द्वारा
October 9, 2012

जयप्रकाश मिश्र   जी ,,,,    बहुत अच्छी प्रस्तुतिके लिये बधाई

satish3840 के द्वारा
May 2, 2012

जयप्रकाश जी बात तो आपने कविता के माध्यम से सही हें / कि जब तक गरीब को लाभ नहीं तो फिर इस अर्थ व्यवस्था का क्या लाभ

Mohinder Kumar के द्वारा
April 27, 2012

जयप्रकाश जी सुन्दर भाव भरी रचना. सच कहा आपने जब पंख बिंधे हों या मन पर कोई बोझ हो तो सांसारिक सुन्दरता कहां भायेगी.

    Jayprakash Mishra के द्वारा
    April 27, 2012

    आदर्णीय मोहिंदर जी स्नेह के लिये आभारी हूं.रिश्ता कायम रखिये.

Jayprakash Mishra के द्वारा
April 24, 2012

आदर्णीय राजीव जी, जलाल साहब और राजेश जी सहित सभी विद्वजनों को नमन करता हूं

Rajesh Dubey के द्वारा
April 22, 2012

देश के यथार्थ को दर्शाती सुन्दर कविता. दिल में पड़ी एक क्षीण रेखा वाकई हमें एक नहीं होने देगी. जरुरत है इस रेखा को मिटाने का.

jalaluddinkhan के द्वारा
April 22, 2012

वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए एक आम व्यक्ति के मन में उठने वाले भाव को आपने बेहद अच्छे ढंग से चित्रित किया है.मन में कसक तो है लेकिन समाज में बढती आर्थिक विषमता का कोई इलाज नज़र नहीं आ रहा.एक अच्छी कविता की प्रस्तुति के लिए बधाई.

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
April 21, 2012

बहुत सुन्दर कविता,जयप्रकाश जी. जहां ख़ुदकुशी पर ख़ुदकुशी कर रहे हों किसान या दिनोंदिन बढ़ रही हो भिखारियों की तादाद क्या ये दिल्ली की सड़कें ……….. ये गगन चुम्बी इमारतें, ये मॉल हमें ख़ुशी दे सकते हैं ? सवाल तो कई हैं,पर जबाब ?

    May 1, 2012

    आपकी बात तो सही है……..सवाल तो हम बहुत उठाते हैं पर यदि जवाब हम लोगों से मांग लिया जय तो फिर घर की जिम्मेदारियों का हवाला देकर पतली गली से निकल जाते हैं…….यह है हमारा सच तो बजाओ ताली………

Jayprakash Mishra के द्वारा
April 21, 2012

आदरणीय अभि जी और संजय जी सहयोग के लिये आभार

sanjay dixit के द्वारा
April 21, 2012

बधाई मित्र ,बहुत सटीक और सार्थक यथार्थपूर्ण ,बहुत अच्छा लगा

abhii के द्वारा
April 20, 2012

क्योकि मेरे दोस्त India shining संसद में बैठे लोगो का तो यही कहना था

Jayprakash Mishra के द्वारा
April 20, 2012

आदर्णीय निशा जी, अनिल जी, आनन्द जी, महिमा जी, अजय जी, अशोक जी,  दिनेश जी, चन्दन जी और योगेन्द्र जी मैं हमेशा ही कृपाकांक्षी रहा हूं तथा हर तरह  की आपकी प्रतिक्रिया को शिरोधार्य किया है.मुझे खुशी है कि वरिष्ठ विद्वानों का दुलार मुझे प्राप्त हो गया है. बहुत - बहुत आभार 

yogi sarswat के द्वारा
April 20, 2012

ये गगन चुम्बी इमारतें, ये मॉल हमें ख़ुशी दे सकते हैं ? जवाब चाहता हूँ – ये ओवरब्रिज, ये हाईवे, ये फुटपाथ सैर के लिए हैं लग्ज़री कारों के या बेघरों के शयन कक्ष . यथार्थ के धरातल पर लिखी पंक्तियाँ जय प्रकाश जी ! बहुत खूब !

चन्दन राय के द्वारा
April 20, 2012

जयप्रकाश जी नमस्कार, मित्रवर मन के भावो की पीड़ा को शब्दश उतार दिया , आपकी कविता सोचने और कुछ करने को प्रेरित करती है

dineshaastik के द्वारा
April 20, 2012

आदरणीय  जयप्रकाश जी,  व्यथित एवं उद्देलित कर देने वाले सवाल…कौन देगा  इनके उत्तर हमें…क्या यूँ ही अनुत्तरित  रहेंगे यह सवाल…

akraktale के द्वारा
April 20, 2012

जयप्रकाश जी नमस्कार, देश की आर्थिक असमानता और सरकार की अस्न्वेदंशीलता पर लिखी आपकी रचना आपकी देश के प्रति चिंता को प्रदर्शित कर रही है. कभी सरकार के नुमाइंदे भी इसे महसूस करें. आभार.

ajaydubeydeoria के द्वारा
April 19, 2012

एक कटु सत्य.

MAHIMA SHREE के द्वारा
April 19, 2012

बहुत अच्छे जयप्रकाश जी.. प्रश्न तो ज्वलंत है……….अगर सुविधाओ से सुख मिलता तो इतनी समस्याए ही न होती…

ANAND PRAVIN के द्वारा
April 19, 2012

जहां ख़ुदकुशी पर ख़ुदकुशी कर रहे हों किसान या दिनोंदिन बढ़ रही हो भिखारियों की तादाद क्या ये दिल्ली की सड़कें ……….. ये गगन चुम्बी इमारतें, ये मॉल हमें ख़ुशी दे सकते हैं ? वाह………………..जयप्रकाश भाई……..आपके प्रश्नों ने तो दिल जीत लिया………..बधाई

April 19, 2012

कटु परन्तु सही सवालों को उजागर करती हुई कृति…..

nishamittal के द्वारा
April 19, 2012

ज्वलंत समस्याओं पर उठाये सटीक प्रश्न .


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