दर्दे - जहान

कहाँ, किस तरह, कैसा क्यों हूँ ? सोच रहा हूँ ऐसा क्यों हूँ ? काँटों के इस बियाबान में , मैं फूलों के जैसा क्यों हूँ ?

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जो नहीं लिखा गया

Posted On: 13 Apr, 2012 में

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बहुत कुछ है जो नहीं लिखा गया
और जो लिखा गया है
वह बहुत कुछ नहीं है
लिखा गया है नारी – दुर्दशा पर
नहीं लिखा गया कि पुरुष भी
झेलते हैं नारी का दंश
लिखा गया है प्रेम की सच्चाई पर
नहीं लिखा गया
कि प्रेम है सबसे बड़ा झूठ
लिखा गया है गरीबी – लाचारी पर
नहीं लिखा गया, कुछ लोगों का
गरीबी ही पेशा है
लिखा गया है जातिवाद के खिलाफ
नहीं लिखा गया
कि जाति – उन्मूलन के नाम पर
पनपाया जा रहा है जातिवाद .

—————————————————————-

मेरी प्रस्तुत कविता शायद कुछ लोगों को पसंद न आये और वे सज्जन मुझसे सहमत भी न हों , पर मैंने वही लिखा है, जिसे भोगा है . हर तरह की खुली प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार .

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20 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jayprakash Mishra के द्वारा
April 16, 2012

आदर सम्मान के पात्र श्री अभि जी, श्री अजय जी,  अनुपम जी, राहुल जी और विकास जी आपने मेरा  उत्साह बढ़ाया, बहुत - बहुत आभार.

vikaskumar के द्वारा
April 15, 2012

प्रत्येक व्यक्ति को अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार है , इसमें सहमति- असहमति की चिंता क्या करना ।

rahulpriyadarshi के द्वारा
April 15, 2012

नमस्ते,सही कहा आपने,त्रस्त तो पुरुष भी होता है,लेकिन नैसर्गिक सहानुभूति की हकदार महिलाएं ही मानी जाती हैं..गरीबी मिटाने में कितने ही अमीर बन गए और जातिवाद मिटाने की कोशिश जातिवाद को और मजबूत कर रही है…आपने यथार्थ अनुभव किया है,साधुवाद.

    Jayprakash Mishra के द्वारा
    April 17, 2012

    ऱाहुल जी सत्य तो यही है, अब कलम के गुलाम कुछ भी लिखें

anupammishra के द्वारा
April 14, 2012

सामाजिक  कुरीतियों पर खंजर की तरह शब्दों का वार…शाबास…

    Jayprakash Mishra के द्वारा
    April 17, 2012

    अनुपम जी स्नेह के लिये आभार

abhii के द्वारा
April 14, 2012

लिखा गया है जातिवाद के खिलाफ नहीं लिखा गया कि जाति – उन्मूलन के नाम पर पनपाया जा रहा है जातिवाद …. जब तक देश में यह जातिवाद उन्मूलन का ढोंग रचाया जाता रहेगा तब तक यह जातिवाद का वटवृक्ष फलता फूलता रहेगा ….

    Jayprakash Mishra के द्वारा
    April 17, 2012

    जी बिल्कुल अभि जी, आभारी हूं

ajaydubeydeoria के द्वारा
April 14, 2012

मिश्रा जी आपने तो बहुत ही तीखे बाण चला दिए. बधाई……

चन्दन राय के द्वारा
April 14, 2012

जयप्रकाश जी नमस्कार , मित्र सच्चाई उजागर करती कविता भाव , मित्रवर मंच पर कभी दीखते हो कभी गायब हो जाते हो , कभी हम नहीं हो पाते, तो मित्र छोड़ो ऐसे ही कविता के बाण जब तक हो तन में आपके प्राण

    Jayprakash Mishra के द्वारा
    April 14, 2012

     चन्दन जी सफर में साथ तो रहिये, झुका न दें हम कलम के सामने तलवार तो कहिये.

Jayprakash Mishra के द्वारा
April 14, 2012

आदर्णीय रक्ताले जी व आस्तिक जी आपकी प्रतिक्रियायें मेरा मार्ग दर्शन करती हैं.आभार. नमन.

akraktale के द्वारा
April 14, 2012

जयप्रकाश जी नमस्कार, इसमें सहमति असहमति जैसी कोई बात नहीं है. जो सत्य है वही लिखा है.मगर भाई मैंने तो प्रेम से अधिक लगता है बेवफाई पर ही ज्यादा पढ़ा है.आपने रचना छोटे में ही समेट दी लिखने को और भी था जो नहीं लिखा गया यदि लिखते तो धार अधिक पैनी होती.फिरभी जितना लिखा है वह भी कम नहीं. साधुवाद.

dineshaastik के द्वारा
April 14, 2012

लिखा गया है जातिवाद के खिलाफ नहीं लिखा गया कि जाति – उन्मूलन के नाम पर पनपाया जा रहा है जातिवाद . बहुत ही सुन्दर…उपरोक्त पंक्तियाँ तो तीक्ष्ण प्रहार करती हुई प्रतीत हो रहीं हैं। आपके विचारों से सहमत….

shashibhushan1959 के द्वारा
April 13, 2012

आदरणीय मिश्रा जी, सादर ! अधिकाँश दिलों के आक्रोश और संशय को आपने शब्द दे दिए ! अच्छी रचना ! मेरी बधाई !

    Jayprakash Mishra के द्वारा
    April 13, 2012

    सम्मान के पात्र श्री शशि जी आप और रक्ताले जी, आस्तिक जी ,  कुशवाहा जी ये ऐसे नाम हैं, जिनकी प्रतिक्रियायें पढ़ कर मुझे  अपना प्रयास सार्थक लगने लगता है.आभार

Jayprakash Mishra के द्वारा
April 13, 2012

अलका जी शुक्रिया, मैं तो सोचता था कि कुछ तीखी प्रतिक्रियायें भी आयेंगी.

alkargupta1 के द्वारा
April 13, 2012

‘नहीं लिखा गया कि पुरुष भी झेलते हैं नारी का दंश ‘ इन पंक्तियों में पतियों की अंतर्व्यथा छिपी हुई है इस पर भी लिखा गया है लिंक दे रहीं हूँ कृपया मेरे इस लिंक पर जाएँ………. http://alkargupta1.jagranjunction.com/2012/03/28/%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A4%BF-%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%AE-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%AF%E0%A5%87-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A5%80-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%89%E0%A4%B8%E0%A4%95/

Jayprakash Mishra के द्वारा
April 13, 2012

महिमा जी आज हिंदी वाले क्यों पिछड़े हैं, क्योंकि वे  हुजूम बनाकर वही घिसी-पिटी बातें लिखते हैं,  जो सत्यता से कोसों दूर होती हैं.  धन्यवाद, आपने मेरा उत्साह बढ़ाया.

MAHIMA SHREE के द्वारा
April 13, 2012

जयप्रकाश जी नमस्कार , आपसे सहमत हूँ , अनदेखे चेहरे ये भी जिनकी तरफ आपने इशारे किये है पर इनकी संख्या कम है शायद इस लिए इन पे कम ही लिखा या बोला गया है.. पर सच्चाई का ये भी चेहरा है इसमें कोई शक नहीं .. बधाई आपको


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