दर्दे - जहान

कहाँ, किस तरह, कैसा क्यों हूँ ? सोच रहा हूँ ऐसा क्यों हूँ ? काँटों के इस बियाबान में , मैं फूलों के जैसा क्यों हूँ ?

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सच का सामना या रिश्तों को मुखाग्नि

Posted On: 26 Apr, 2012 Others में

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रियालिटी शो चल रहा है . मंच पर एंकर के अलावा दो जोड़े और एक बच्चा दिखाई दे रहा है. एंकर उस युवक को समझा रहा है, जो अटपटे – चटपटे और तीखे सवालों के लिए तैयार हो रहा है . पास ही उसकी पत्नी बैठी है और कुछ दूरी पर उसके माँ – बाप . एंकर बताता है कि वह पहले राउंड में उससे पांच सवाल करेगा, जिनका सही जवाब देकर वह पूरे ५० लाख रुपये जीत सकता है. सभागार में दर्शकों का हुजूम. पहला सवाल आता है – ” क्या आपने कभी अपने दोस्त की माँ से शारीरिक सम्बन्ध बनाए हैं?”
युवक सभागार में उपस्थित अपने दोस्तों की तरफ देखता है. भय और लालच का द्वंद्व. चेहरा सफ़ेद पड़ जाता है, आँखे शर्म से लाल हो जाती हैं .दोस्त की माँ…….यानी उसकी माँ की हमउम्र . उसकी माँ साँसें रोके हुए बैठी है. नहीं……..उसका बेटा ऐसा नहीं हो सकता.वह सोचती है. बेटा जवाब देता है – “हाँ”…….. और पोलीग्राफ टेस्ट इसकी पुष्टि करता है.
दूसरा सवाल – “क्या इस वक्त भी किसी अन्य महिला से आपका प्रेम – प्रसंग चल रहा है?”
सभी की साँसें थम जाती हैं. पत्नी की आँखों में पत्थर उड़ रहे हैं. युवक शर्म और लालच मिश्रित स्वर में उत्तर देता है – “हाँ”……..और पूरा माहौल सहसा ग़मगीन हो जाता है. पत्नी लाख प्रयास के बाद भी आंसू नहीं रोक पाती. उसे पति की बेवफाई पर गुस्सा आ रहा है. सभागार में बैठे दोस्त अंदाजा लगा रहे हैं – कहीं मेरी माँ के साथ …….या पत्नी के साथ तो नहीं ………आदि – आदि .
यह एक रियलिटी शो की एक छोटी सी झलक थी, जिसे लिखे बगैर शायद यह लेख सार्थक नहीं हो पाता. पिछले दिनों अमुक टीवी शो देखने के बाद कई विचारणीय प्रश्न मस्तिष्क में उभरे, जिन्हें अभिव्यक्ति देना मेरी मजबूरी हो गई है.
मुण्डक उपनिषद् की एक उक्ति है, जो कि हमारा राष्ट्रीय वाक्य भी है – “सत्यमेवजयते”. यह सही है कि सत्य की हमेशा विजय होती है , परन्तु सफ़ेद झूठ, जिसे एक व्यक्ति वर्षों से अपने माँ – बाप और पत्नी से छुपाता रहा, उसे लोभ वश मंच से उगलना सच कैसे हो सकता है. ऐसे सच की कभी विजय नहीं हो सकती. ऐसा सच मंच से उगल कर लोग पैसे तो कमा सकते हैं मगर प्रतिष्ठा नहीं. इस प्रकार के सच से जीता हुआ धन कितना दुखता है,यह तो सिर्फ जीते हुए प्रतिभागी ही जानते होंगे. धन और प्रतिष्टा में बहुत बड़ा अंतर होता है. व्यक्ति प्रतिष्ठा को दाँव पर लगाकर धन तो कमा सकता है मगर धन लगाकर प्रतिष्ठा को नहीं. रिश्ते कभी सोने की जंजीरों में कैद नहीं होते, उन्हें बांधने के लिए विश्वास के कच्चे धागे ही काफी होते हैं. इस तरह वह व्यक्ति चंद पैसों के लिए अपनी प्रतिष्ठा को बेंचकर परिवार और समाज में दुश्मनी खरीदता है और आजीवन पछताता है.
संभवतः यह सवाल सर्वप्रथम ‘प्रेम भारद्वाज’ ने अपनी कहानी ‘था मैं नहीं’ में उठाया था, जो कि जागरण प्रकाशन की पत्रिका ‘पुनर्नवा’ में प्रकाशित हुई थी.मैं यह तो नहीं जानता कि यह सवाल उन्होंने उक्त टीवी शो पर उठाया था या बाज़ारबादी व्यवस्था पर, परन्तु इतना अवश्य जानता हूँ कि इस तरह के कार्यक्रम धनार्जन और सामाजिक अशांति के सिवा कुछ नहीं कर सकते.मैं जानता हूँ कि मेरी आवाज महज यह कहकर दबा दी जायेगी कि हमारे संबिधान में हर किसी को अपना स्वतंत्र रोजगार करने का मौलिक अधिकार दिया गया है, परन्तु यह कोई नहीं बतायेगा कि रोजगार कहते किसे हैं? यदि इस तरह के कार्यक्रमों को सही मान लें तो वेश्या वृत्ति और अवैध शराब तथा हथियारों की बिक्री को क्या कहेंगे.क्या हम ऐसे धंधों को खुलेआम चलने देंगे? यदि नहीं , तो फिर इस समस्या पर भी विचार किया जाना चाहिए.यह तर्क सही नहीं है कि वहां लोग स्वेच्छा से जाते हैं. वेश्यालयों और शराबखानो में भी कोई बलात नहीं ले जाया जाता.सब स्वेच्छा से ही जाते हैं. परन्तु उसे अवैध समझा जाता है. इसलिए कि उससे मानव मूल्यों का ह्रास होता है, अशांति फैलती है.
और वही अशांति ये टीवी शो भी फैलाते हैं. इन्हें रोका जाना चाहिए.
——————————————————————————————————————————————
– जयप्रकाश मिश्र

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24 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jayprakash Mishra के द्वारा
April 29, 2012

आदर्णीय रेखा जी व अंकुर जी नमन, स्नेह के लिये आभारी हूं. मुझे खुशी है कि विभिन्न मू्र्धन्य रचकारों ने इस विषय पर मेरा हौसला बढ़ाया है.

rekhafbd के द्वारा
April 28, 2012

आदरनीय जय प्रकाश जी ,सही लिखा है अपने धन और प्रतिष्ठा में बहुत अंतर होता है ,मै आपके विचारों से सहमत हूँ ,आभार

Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
April 28, 2012

भाई जय प्रकाश जी- बहुत ही सही मुद्दा उठाया है आपने. गलत रास्ते से पैसा तो कमाया जा सकता है लेकिन प्रतिष्ठा नहीं. इस तरह के रिअलिटी शो बहुतों की ज़िन्दगी में ज़हर घोल रहे है.

ANAND PRAVIN के द्वारा
April 27, 2012

जयप्रकाश जी, नमस्कार बहोत ही सुन्दर तरीके से एक सार्थक विषय को लिखा है आपने

    Jayprakash Mishra के द्वारा
    April 28, 2012

    आनन्द जी हार्दिक आभारी हूं.

minujha के द्वारा
April 27, 2012

जयप्रकाश जी बहुत अच्छा विषय उठाया है आपने,पैसे के लिए इंसान की नैतिकता का मखौल उङाना ही, ऐसे कार्यक्रमों का उद्देश्य है,अच्छा आलेख

    April 28, 2012

    जी बुरा न मानियेगा, जब नैतिकता है ही नहीं तो उसे उड़ना क्या…..चंद लोगो की बात छोड़ दीजिये….यदि इतनी नैतिकता रहती तो हम लोग ऐसा काम करते ही नहीं जो अनैतिक है……हाँ बुरा लगता है क्योंकि सच्चाई यहाँ पर सच के लिए नहीं बल्कि एक और झूठ ( पैसा ) के लिए स्वीकार की जा रही है…….

    Jayprakash Mishra के द्वारा
    April 28, 2012

    आदर्णीय मीनू जी नमन आप जैसे बुद्धि जीवियों से यही अपेक्षा करता हूं. देखता हूं इस विषय पर कितने विद्वान सहमत होते हैं

    Jayprakash Mishra के द्वारा
    April 28, 2012

    आदर्णीय अनिल जी नमन नाक चाहे आगे से पकडिये या पीछे से, वह रहेगी नाक ही.

Jayprakash Mishra के द्वारा
April 27, 2012

आदर्णीय निशा जी नमन मैंने तो आवाज उठाई है, अब इस आवाज को बुलन्दी देना बुद्धिजीवियों  का भी कर्तव्य बनता है. देखता हूं कितना सहयोग मिल पाता है.

    April 28, 2012

    मैं तो समझता हूँ कि इन रियलिटी शो को को बंद करने कि जरूरत नहीं बल्कि हमें अपने क्रिया कलापों को बदलने कि जरूरत है. जहाँ इस समाज में चंद पैसों और कुछ जमीं के टुकड़ों के लिए हम सभी हरेक रिश्तों को ताड़-ताड़ कर दिए है तो पैसे के लिए यदि अपनी एक गलती स्वीकार करते हैं तो इसमे बुराई क्या? इसलिए मैं तो आपकी इन बातों का समर्थन नहीं करूँगा….आप तो एक पत्रकार है. समझ सकता हूँ कि आप कि व्यस्तता को पर जो खबरे आप देख रहे उसे खुद पर हावी मत होने दीजिये……और दो-चार घंटे चिंतन और मनन करिए…ताकि समस्या की जड़ पकड़ी जा सके……हार्दिक आभार.

nishamittal के द्वारा
April 27, 2012

आपके विचारों से सहमति है,मेरी जयप्रकाश जी,परन्तु ऐसे कार्यक्रम का बहिष्कार होना चाहिए

    April 28, 2012

    और जो हर रोज आये दिन हम सभी आस-पड़ोस में कार्यक्रम कर रहे हैं……उसका क्या?

Jayprakash Mishra के द्वारा
April 27, 2012

आदर सम्मान के पात्र चन्दन जी, गौरव जी, अजय जी, आस्तिक जी,  शशि जी, राजकमल जी व रक्ताले जी आपका स्नेह हमें प्रोत्साहित करता है. हार्दिक बन्दन करता हूं

akraktale के द्वारा
April 27, 2012

जयप्रकाश जी नमस्कार, अतिआधुनिक मानव और उसका रुपयों से प्रेम यदि सब रटारटाया नहीं है तो ऐसा जीवन ही व्यर्थ है.

Rajkamal Sharma के द्वारा
April 26, 2012

प्रिय जय प्रकाश जी इस प्रोग्राम में जब तलक प्रतिभागी अपने खिलाफ बयानबाजी करता रहेगा आगे ही आगे तरक्की की सीढिया चढ़ता चला जाएगा लेकिन जहाँ पर उसने अपनी खुद की फेवर की वहीँ पर उसका पत्ता साफ़ हो जाएगा ….. और भी गम है जमाने में इसलिए मैं ऐसे प्रोग्राम नहीं देखता सुंदर विचारो और साफ़ सुथरे दृष्टिकोण पर मुबारकबाद

shashibhushan1959 के द्वारा
April 26, 2012

आदरणीय जयप्रकाश जी, सादर ! ठीक कहा आपने – धन की वेदी पर रिश्तों की बलि चढ़ा कर कमाई हुई दौलत कितनी सार्थक है, यह तो वे ही जानते होंगे ! पर ऐसे कार्यक्रम सार्वजनिक रूप से दिखाना कतई उचित नहीं है ! मैं भी इसका विरोध करता हूँ !

    dineshaastik के द्वारा
    April 27, 2012

    आदरणीय  जयप्रकाश  जी नमस्कार, आदरणीय  शशि जी के विचारों से मैं पूर्णतः सहमत…..

    vikramjitsingh के द्वारा
    April 27, 2012

    आदरणीय जयप्रकाश जी प्रणाम, आदरणीय शशि जी के विचारों से हम भी पूर्णतः सहमत……..

    April 28, 2012

    और मैं इसका समर्थन करता हूँ……यदि अपनी हवश के नाजायज सम्बन्ध बनाना सही है और अपने स्वार्थ के लिए भाई और बाप को मारना, गली देना सही है, अपने स्वार्थ के लिए किसी की बेटी और बहन को बेटी-बहन समझाना सही है तो यह भी सही है……कम से कम हमारे पीछे की पीढ़ियों को हम शरीफों की सराफत तो पता चल रहा है…….वैसे भी धतुरा लगाने पर गुलाब नहीं मिलाने वाला…….हाँ…..हां….हाँ…..बेहतर होगा कि कल्पनाओं कि दुनिया से निकलकर हम सच कि दुनिया का सामना करें और अपने अन्दर और आस-पास की बुराइयों पर ध्यान केन्द्रित करते हुए, एक सार्थक प्रयास करें……और किसी को बुरा लगा हो तो मैं फिर बता देना चाहता हूँ कि मैं माफ़ी नहीं मांगनेवाला……

    April 28, 2012

    और मैं असहमत है…..

ajaydubeydeoria के द्वारा
April 26, 2012

जे पी जी नमस्कार, बाकी बातें बाद में अभी तो मैं इस लाइन पर आप को बधाई देना चाहूँगा.. “व्यक्ति प्रतिष्ठा को दाँव पर लगाकर धन तो कमा सकता है मगर धन लगाकर प्रतिष्ठा को नहीं. रिश्ते कभी सोने की जंजीरों में कैद नहीं होते, उन्हें बांधने के लिए विश्वास के कच्चे धागे ही काफी होते हैं” .बहुत शानदार बात कही है….

कुमार गौरव के द्वारा
April 26, 2012

जयप्रकाश जी सादर! इस तरह के दोयम दर्जे के टीवी प्रोग्राम्स किसी दृष्टि से लाभकारी नहीं होते…मैं भी इनके सख्त खिलाफ हूँ…

चन्दन राय के द्वारा
April 26, 2012

मिश्रा जी , आपने उपरोक्त विषय पर बहुत ही उम्दा विवेचना की है, जो मेरी विचारधारा पर इकदम खरा उतरता है , पर मित्र हर किसी को आजादी है अपनी अभिव्यक्ति की , यदि हम ही इसे बढ़ावा न दे तो ये चीजे स्वत ही बंद हो जाएगी ,


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